मेरी शब्दों के ज़रिए देखे मुझे

मैं चाहती हु,
जब भी मुझे कोई देखे,
मेरी शब्दों के ज़रिए देखे मुझे ।
शब्दों में छुपी हुई कहानी
वह खुद से सुलझाए ।
थोड़ा मेहनत करे सोचने में,

मैं जैसी हु, क्यों हु।
बिन कहे वो समझ पाए,
मेरी पसंद और नापसंद ,
इतनी बड़ी सपने नहीं है,
बस पता हो उससे,
मैं बिना इजहार किए प्यार करती हूं।
बिना जताए,
किसी और के लिए
सब उसके नाम करने से डरती नहीं हूँ।

मैं नाराज़ रहूं,
वह महंगे चीजों से नहीं,
कुछ किताबों से मनाए मुझे।
कहीं दूर ना सही,
हाथ ना छोड़े घुमाने ले जाए,
और उतना ना हो तो बस
मेरी पसंद की खिचड़ी खिलादे मुझे।

मैं चुप रहूं,
वह कविताएं सुनाए,
मेरी लिखी कविताएं में
अपने आप को मिलाए मुझे ।

मैं प्यार करूंगी उससे,
इतनी कि सुबह की काफ़ी छोड़ के,

मैं उसके साथ एक प्याले
अदरक वाली कड़क चाय पियूंगी ।

मैं उसके लिए 
अपनी चांद, फूल, सफ़र, आसमान, बारिश छोड़ के,
उसके लिए कविता लिखूंगी।

गंगा घाट के किनारे,
सफ़ेद कुर्ते में,
बिखरे बालों में,
हाथ पे हाथ थाम के बैठेंगे तो,
वादा रहा,

मैं सब नजारा छोड़ के उसको ताकते रहूंगी।
और अगर तब भी प्यार कम पड़ जाए,
किताबों का नाम भी तुम्हारी नाम।

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