कहाँ तेरी किस्मत में खुशी और प्यार है?
काफ़ी दिनों बाद आज फिर से लिखने की यह वजह हुई है, लगता है दिल में फिर किसी गहरे दर्द की जगह हुई है। खुश रहने की मैंने तो हर एक कोशिश कर देखी, पर वक्त ने हर बार मेरी बदनसीबी दिखा दी... कहता है वक्त— 'कहाँ तेरी किस्मत में खुशी और प्यार है?' तू तो बस ग़म-ए-दिल के साये में जीने को लाचार है। वह शख्स कहता तो है कि बेइंतिहा प्यार करता है मुझसे, पर खुदा जाने, किस क़दर और कैसा प्यार करता है मुझसे! ना उसे मेरे बहने वाले आँसू कभी दिखते हैं, ना मेरी खामोशी के पीछे छुपे ग़म दिखते हैं। ना अब उसका दिल करता है मुझे एक नज़र देखने का, ना कोशिश करता है मेरा हाल-ए-दिल समझने का... वह क्या जाने कि किस तरह से प्यार किया जाता है, कैसे किसी के टूटे दिल को आग़ोश में लिया जाता है। उसकी हर एक आदत में मैं बस प्यार को ढूँढती हूँ, ज़िंदगी में उसकी अपना वजूद मैं ढूँढती हूँ। पर सच तो यह है कि मेरा कोई हिस्सा ही नहीं उसकी दास्तान में, मैं बस एक नाम की भागीदार हूँ उसके आशियाने में। ना जाने क्या सिखा गई उसे वह पहली लड़की उस दौर में, मैं कितनी भी कोशिश कर लूँ, कम ही रहूँगी उसके शहर में। वैसा प्यार शायद मुझे कभी नसीब ही ...