सफ़र मैं हिस्सेदारी ख़त्म होने पे भी भारी सा लगता है ।
तुम, मैं, हम सब बिना चाहे भी
एक कहानी के हिस्से बनते हैं।
तुम मानो या ना मानो
एक खालीपन
तुम्हारी, मेरी और हमारी हिस्सेदारी है।
और वो कहानी,
हमारी जिंदगी का हिस्सा बनते जाते हैं।
एक रोज फिर से,
तुम अपने रास्ते निकल जाओगे,
और मैं अपने।
एक सुबह होगी,
फिर टकरायेंगे किसी कहानी में हम,
हम मिलेंगे, मैं तुम्हें अपनी seat से बैठने को बोलूंगी,
तुम मुस्कुराना, बैठ जाना
और मेरे station तक मुझे छोड़ने आना।
सफ़र मैं हिस्सेदारी ख़त्म होने पे भी भारी सा लगता है ।
एक कहानी के हिस्से बनते हैं।
तुम मानो या ना मानो
एक खालीपन
तुम्हारी, मेरी और हमारी हिस्सेदारी है।
और वो कहानी,
हमारी जिंदगी का हिस्सा बनते जाते हैं।
एक रोज फिर से,
तुम अपने रास्ते निकल जाओगे,
और मैं अपने।
एक सुबह होगी,
फिर टकरायेंगे किसी कहानी में हम,
हम मिलेंगे, मैं तुम्हें अपनी seat से बैठने को बोलूंगी,
तुम मुस्कुराना, बैठ जाना
और मेरे station तक मुझे छोड़ने आना।
सफ़र मैं हिस्सेदारी ख़त्म होने पे भी भारी सा लगता है ।
Comments
Post a Comment