दीयों की तरह हम भ
दीयों की तरह हम भी,
कभी साथ जलते हैं,
कभी दूर रखे रह जाते हैं।
तुम्हारे आँगन की रौशनी
शायद मुझसे ज्यादा चमके,
पर मेरी खिड़की पर रखा वो दिया
अब भी तुम्हारा नाम जानता है।
कितना अजीब है,
हम दोनों रौशनी के बीच हैं,
फिर भी कुछ बातें
अँधेरे में रह जाती हैं।
दीपावली है,
लोग मिल रहे हैं, सजावटें हो रही हैं,
और मैं बस सोच रही हूँ
कहानियाँ भी काश
फिर से जल उठतीं दीयों की तरह।
कभी साथ जलते हैं,
कभी दूर रखे रह जाते हैं।
तुम्हारे आँगन की रौशनी
शायद मुझसे ज्यादा चमके,
पर मेरी खिड़की पर रखा वो दिया
अब भी तुम्हारा नाम जानता है।
कितना अजीब है,
हम दोनों रौशनी के बीच हैं,
फिर भी कुछ बातें
अँधेरे में रह जाती हैं।
दीपावली है,
लोग मिल रहे हैं, सजावटें हो रही हैं,
और मैं बस सोच रही हूँ
कहानियाँ भी काश
फिर से जल उठतीं दीयों की तरह।
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