काफिर कोई भाषा नहीं, कोई एहसास है।

काफिर,
कौन है?
तुम में, शायद हम सब!
वो ईश्वर को नहीं मानता,
वो बेवक़त करता है, मेरे रे, अजनबी रे।
हर नियम से बाहर खड़ा है,
बचनों को नहीं मानता, अपने दम का शागिर्द है।
वो इश्क़ को मज़बूत से ऊँपर रखता है,
और कर्मों को तक़रीर से।
काफिर कोई भाषा नहीं, कोई एहसास है।
वो शब्द सिर्फ़ एक शब्द नहीं, हमारे भीतर का आईना है।
सफर जीवन है, काफिर जिज्ञासा ।

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