राधा की जलन
कहते हैं राधा ने कभी ईर्ष्या नहीं की,
पर ख़ुदा ही जानता है,
हर बार जब गोपियाँ बाँसुरी पर मुस्कराती थीं,
उसका दिल काँप जाता था।
वो जानती थी,
कृष्ण उसका था,
पर प्रेम?
प्रेम तो नदी है,
किसी के नाम पर नहीं रुकता।
वो अक्सर ईश्वर से लड़के कहती,
“तूने मुझे इतना प्रेम दिया, फिर छीन भी क्यों लिया?”
और ईश्वर मुस्कराकर बोलते,
“जिसे खो देने पर भी तू प्रेम करे, वही सच्चा प्रेम है।”
राधा तब चुप हो जाती —
आँखों में आँसू नहीं,
बस एक धीमी मुस्कान रह जाती,
जैसे उसने ईर्ष्या में भी
प्रेम का अर्थ खोज लिया हो।
क्योंकि सच्चे प्रेम में
वियोग भी पूजा बन जाता है,
और खोया हुआ कृष्ण
दिल में ही मंदिर रच देता है।
पर ख़ुदा ही जानता है,
हर बार जब गोपियाँ बाँसुरी पर मुस्कराती थीं,
उसका दिल काँप जाता था।
वो जानती थी,
कृष्ण उसका था,
पर प्रेम?
प्रेम तो नदी है,
किसी के नाम पर नहीं रुकता।
वो अक्सर ईश्वर से लड़के कहती,
“तूने मुझे इतना प्रेम दिया, फिर छीन भी क्यों लिया?”
और ईश्वर मुस्कराकर बोलते,
“जिसे खो देने पर भी तू प्रेम करे, वही सच्चा प्रेम है।”
राधा तब चुप हो जाती —
आँखों में आँसू नहीं,
बस एक धीमी मुस्कान रह जाती,
जैसे उसने ईर्ष्या में भी
प्रेम का अर्थ खोज लिया हो।
क्योंकि सच्चे प्रेम में
वियोग भी पूजा बन जाता है,
और खोया हुआ कृष्ण
दिल में ही मंदिर रच देता है।
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