Posts

Happy 25th anniversary, ବାବା and ମାମା !

Image
ଆକାଶରୁ ଶ୍ରାବଣର ସେଇ ବାରିଧାରା ଯେତେବେଳେ ଢେଙ୍କାନାଳ ପାହାଡ଼ିଆ ରାସ୍ତାକୁ ଭିଜେଇ ଦିଏ, ଠିକ୍ ସେତିକିବେଳେ ମନର କୋଣରେ ଜମି ରହିଥିବା ସ୍ମୃତିର ପାଉଁଶ ତଳୁ କିଛି ନିଆଁର ଝୁଲ ଦାଉ ଦାଉ ହୋଇ ଜଳିଉଠେ। ଠିକ ସେମିତି, ହେଇ ହେଇ ଦି ଯୁଗ ବିତିଗଲା | ପଚିଶ ବର୍ଷ! ଶୁଣିବାକୁ ଗଲେ ଏଇଟା ଖାଲି ଗୋଟେ ସଂଖ୍ୟା ଭଳି ଲାଗେ, ହେଲେ ଏଇ ପଚିଶଟା ବର୍ଷର ଯାତ୍ରା ଭିତରେ କେତେ ଯେ ଅକୁହା କାହାଣୀ ଲୁଚି ରହିଛି, ତାହା କେବଳ ଏହି ଘରର ଚାରିକାନ୍ଥ ହିଁ ଜାଣନ୍ତି। ଆଜି ଯେତେବେଳେ ବାବା ଆଉ ମାମାଙ୍କର ଏହି ବିଭାହ ବାର୍ଷିକୀ, ଧନ୍ୟବାଦ ସେ ଜ୍ୟୋତିଷ କୁ ଯିଏ ପ୍ରସ୍ତାବ ନେଇ ଆସିଥିଲା ଆଉ ଧନ୍ୟ ପରିବାର ଲୋକ ସବୁ ଯିଏ ରାଜଯୋଟକ ଖୁସି ରେ ବାହାଘର କରିଦେଲେ | ମୁଁ ଭାବେ ଏଇ ‘ରାଜଯୋଟକ’ ବାହାଘର ସତରେ କ’ଣ? ୟାର ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଉଦାହରଣ ହେଉଛନ୍ତି ମୋ ବାବା ଆଉ ମାମା। ସତରେ, ଯେତିକି ଜଲ୍ଦି ଆମ ଘରେ ଝଗଡ଼ା ଆରମ୍ଭ ହୁଏ, ସେତିକି ଜଲ୍ଦି ସରି ବି ଯାଏ। ଆମ ଘରେ ସବୁଠୁ ଲମ୍ବା ଝଗଡ଼ା ବୋଧେ ଘଣ୍ଟେ ପାଇଁ ଚାଲେ। ହାଲ୍ଲା ହୁଏ, ପୁଣି ସମସ୍ତେ ଥକିଯାଇ ନିଜକୁ ନିଜେ ସ୍ୱାଭାବିକ କରିଦିଅନ୍ତି। ଏଇଟା ହିଁ ତ ରାଜଯୋଟକର ସୁନ୍ଦରତା ବୋଧେ| ପିଲାଦିନର କଥା ତ ମୋର ଏତେ ମନେ ନାହିଁ, ହେଲେ ଏବେ ବଡ଼ ହେଲା ପରେ ଜାଣିଲି, ମୁଁ ସମସ୍ତଙ୍କ ଭଳି ‘ନନା’ କି ‘ବୋଉ’ ଡାକିପାରୁନଥିଲି। ମୋ ପାଟିରୁ ପ୍ରଥମେ ବାହାରିଥିଲା ସେଇ ‘ବାବା’ ଆଉ ‘ମାମା’। ଆଜି ବୁଝୁଛି, ଏକ ...

Her love isn’t for places

She chases the city lights, clicking moments that feel like whispers. Every frame narrates a story, every street a promise of new beginnings. Her love isn’t for places, but for the magic they let her carry home.

मेरी शब्दों के ज़रिए देखे मुझे

मैं चाहती हु, जब भी मुझे कोई देखे, मेरी शब्दों के ज़रिए देखे मुझे । शब्दों में छुपी हुई कहानी वह खुद से सुलझाए । थोड़ा मेहनत करे सोचने में, मैं जैसी हु, क्यों हु। बिन कहे वो समझ पाए, मेरी पसंद और नापसंद , इतनी बड़ी सपने नहीं है, बस पता हो उससे, मैं बिना इजहार किए प्यार करती हूं। बिना जताए, किसी और के लिए सब उसके नाम करने से डरती नहीं हूँ। मैं नाराज़ रहूं, वह महंगे चीजों से नहीं, कुछ किताबों से मनाए मुझे। कहीं दूर ना सही, हाथ ना छोड़े घुमाने ले जाए, और उतना ना हो तो बस मेरी पसंद की खिचड़ी खिलादे मुझे। मैं चुप रहूं, वह कविताएं सुनाए, मेरी लिखी कविताएं में अपने आप को मिलाए मुझे । मैं प्यार करूंगी उससे, इतनी कि सुबह की काफ़ी छोड़ के, मैं उसके साथ एक प्याले अदरक वाली कड़क चाय पियूंगी । मैं उसके लिए  अपनी चांद, फूल, सफ़र, आसमान, बारिश छोड़ के, उसके लिए कविता लिखूंगी। गंगा घाट के किनारे, सफ़ेद कुर्ते में, बिखरे बालों में, हाथ पे हाथ थाम के बैठेंगे तो, वादा रहा, मैं सब नजारा छोड़ के उसको ताकते रहूंगी। और अगर तब भी प्यार कम पड़ जाए, किताबों का नाम भी तुम्हारी नाम।

रास्ते भी थकते होंगे ?

रास्ते भी थकते होंगे ? रास्तों की हिस्से कोई ठहरने वाला क्यों नहीं हैं ? रास्तों को भी चाहिए होता है एक हमसफ़र ? गांव की मिट्टी सड़कों से पक्की सड़क मैं इतनी दूरियां क्यों हैं ? पैर मैं मचल जाते वो फूल की खुशबू कहां जाते होंगे ? रास्ते मैं उड़ते हुए सूखे पत्ते को समेट ने को कोई आता होगा ? रास्तें मुश्किल होते है कि हम लगाव से उन्हें बना देते हैं ?

दीयों की तरह हम भ

दीयों की तरह हम भी, कभी साथ जलते हैं, कभी दूर रखे रह जाते हैं। तुम्हारे आँगन की रौशनी शायद मुझसे ज्यादा चमके, पर मेरी खिड़की पर रखा वो दिया अब भी तुम्हारा नाम जानता है। कितना अजीब है, हम दोनों रौशनी के बीच हैं, फिर भी कुछ बातें अँधेरे में रह जाती हैं। दीपावली है, लोग मिल रहे हैं, सजावटें हो रही हैं, और मैं बस सोच रही हूँ कहानियाँ भी काश फिर से जल उठतीं दीयों की तरह।

राधा की जलन

कहते हैं राधा ने कभी ईर्ष्या नहीं की, पर ख़ुदा ही जानता है, हर बार जब गोपियाँ बाँसुरी पर मुस्कराती थीं, उसका दिल काँप जाता था। वो जानती थी, कृष्ण उसका था, पर प्रेम? प्रेम तो नदी है, किसी के नाम पर नहीं रुकता। वो अक्सर ईश्वर से लड़के कहती, “तूने मुझे इतना प्रेम दिया, फिर छीन भी क्यों लिया?” और ईश्वर मुस्कराकर बोलते, “जिसे खो देने पर भी तू प्रेम करे, वही सच्चा प्रेम है।” राधा तब चुप हो जाती — आँखों में आँसू नहीं, बस एक धीमी मुस्कान रह जाती, जैसे उसने ईर्ष्या में भी प्रेम का अर्थ खोज लिया हो। क्योंकि सच्चे प्रेम में वियोग भी पूजा बन जाता है, और खोया हुआ कृष्ण दिल में ही मंदिर रच देता है।

काफिर कोई भाषा नहीं, कोई एहसास है।

काफिर, कौन है? तुम में, शायद हम सब! वो ईश्वर को नहीं मानता, वो बेवक़त करता है, मेरे रे, अजनबी रे। हर नियम से बाहर खड़ा है, बचनों को नहीं मानता, अपने दम का शागिर्द है। वो इश्क़ को मज़बूत से ऊँपर रखता है, और कर्मों को तक़रीर से। काफिर कोई भाषा नहीं, कोई एहसास है। वो शब्द सिर्फ़ एक शब्द नहीं, हमारे भीतर का आईना है। सफर जीवन है, काफिर जिज्ञासा ।

Maybe, that’s what life is

I watched 8 A.M. Metro and felt like the film was quietly reading parts of me I never said aloud. It’s not really about trains or destinations, it’s about pauses, the kind we take when life feels too noisy inside. Saiyami Kher’s Iravati isn’t just a character; she’s every person who wakes up, shows up, and still carries an unnamed ache. And Gulshan Devaiah’s Preetam; he doesn’t save her, he simply sees her. Sometimes, that’s all we need. To be seen. To be understood without explanation. The film reminded me that companionship doesn’t always arrive as love stories do. Sometimes it arrives as poetry on a tired morning, as a stranger who listens, as silence that feels safe. We’re all on our own metros, missing stops, taking wrong ones, finding unexpected faces that make the journey softer.  Maybe, that’s what life is, not about reaching, but about who sits beside us for a few stations.

ତୁମକୁ, ମୋତେ, ଓ ଅସଫଳତାକୁ ସମାନ ଭାବେ

ଜଙ୍ଗଲ କାହାକୁ ଜାଣେନି, ତୁମେ, ମୁଁ, ଆମେ ସବୁ ତା ସାମ୍ନା ରେ ସମାନ। ତୁମେ କେତେ କଣ ହାରିକି ଆସିଛ, କେତେ କଣ ଜିତି ଯାଇଛ, କେତେ ଧନୀ, କେତେ ଗରିବ , କିଛି ଜାଣେନି, କି ଜାଣିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରେନି ତା’ର ପାଇଁ ସବୁ ପାଦଚିହ୍ନ ସମାନ, ଯିଏ ବି ଡାକି ଦେଲେ ଓ କରିବ , କୋଳେଇ ନେବ । ଗଛ ପଚାରେନି, ତୁମେ ଖୁସି ର ଗନ୍ଧ ନେଇ ଆସିଛ, ନା ଅଭିମାନର ସୁଗନ୍ଧ। ସେ ପତ୍ର ଝଡାଏ, ଚଲା ରାସ୍ତା ରେ ବିଞ୍ଚି ଦିଏ ଫୁଲ, ସମସ୍ତ ଙ୍କ ପାଇଁ ସେଇ ସମାନ ପ୍ରତିଧ୍ୱନି ରେ | ପ୍ରେମ ଏଠି ନିଷ୍ପକ୍ଷ, ଆଲିଙ୍ଗନ କରେ ତୁମକୁ, ମୋତେ, ଓ ଅସଫଳତାକୁ ସମାନ ଭାବେ।

ସେ ମାୟାବିନୀ

ସେ ମାୟାବିନୀ, ସେ ଜାଣେ, କେବେ ହସିବାକୁ ହୁଏ ଫୁଲ ଭଳି, କେବେ ଚୁପ ରହିବାକୁ ରାତି ଭଳି। ତା’ର ଆଖିର କଜଳ ରୁ ଜନ୍ମ ନିଏ, ଗାଢ଼ ଅନ୍ଧାର ରାତି, ବାସର ଶେଯ ସଜାଇ, ସେ ଅକ୍ତିଆର କରେ ପୁରୁଷତ୍ଵ କୁ, ସେ ଜଳ ଭଳି ନିର୍ମଳ, ତାର ନାରୀତ୍ଵ ଆଭା ପାଇଁ ସଂସାର ସାଧନା କରେ, ସେ ଶିଳାକୁ ବି ସ୍ନେହରେ ନମାଇ ପାରେ, ସେ ଅଠର ରାତି ଅନିଦ୍ରା କରି, ଯୁଦ୍ଧ ବି କରିପାରେ। ସେ ମାୟାବିନୀ, ସେ ମାନବ ର ସୃଷ୍ଟି ନୁହେଁ, ମନୁସତ୍ଵ ର କଳ୍ପନା ନୁହେଁ, ସେ ଏକ ନିଜସ୍ୱ ସୃଷ୍ଟି, ଯେଉଁଥି ନିଜ ଆଘାତରୁ ସେ ଫୁଲ ତିଆରି କରେ , ଆଉ ନିଜ ପାଇଁ ମାଳ ଗୁନ୍ଥି ନିଜେ ପିନ୍ଧେ। ତା’ର ଶକ୍ତି ନିର୍ବଳତାର ର ଅକ୍ତିଆର ରୁ ଦୂର ରେ, ତା’ର ଶାନ୍ତି ଝଡର ମଝିରେ ବଖରାଏ ଘର କରି ରୁହେ, ସେ ମାୟାବିନୀ, ଯାହାକୁ ବୁଝିବା ଚେଷ୍ଟା କଲେ, ହାରିଯାଏ ମଣିଷ।

ବିଶ୍ୱ ମାତୃ ଦିବସର ଶୁଭେଚ୍ଛା

ସବୁ ବିଷୟରେ ଲେଖିବା କେତେ ସହଜ , ହେଲେ ମାଆ ମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ କିଛି ଲେଖିବା ପାଇଁ ମୁଁ ବହୁତ ଚେଷ୍ଟା କଲେ ବି ଲେଖିପାରେନି| ଯେତେ ଲେଖିଲେ କିଛି ନା କିଛି ରହିଯାଏ | ଆଜି ବି କିଛି ଲେଖିଛି ଆଉ ବହୁତ କିଛି ରହିଯାଇଛି। ନିଜକୁ ବହୁତ ସାଧାରଣ ବୋଲି ଭାବୁଥିବା ମଣିଷ ଯେ ଏତେ ବଡ ପରିବାର କୁ ବାନ୍ଧି ରଖିଛି , ଘର କୁ ଘର କରି ରଖିଛି , ସାଧାରଣ ମାଟି କୁ ସୁନା କରିଦେଇଛି। ବିନା କିଛି ସର୍ତ୍ତ ରେ ନିଜର ଅସ୍ତିତ୍ବ୍ୟ କୁ ଜଳାଞ୍ଜଳି ଦେଇଦିଏ, ଝିଅ ବେଳେ ମୁହଁ ଫୁଲଉଥିବା ଗେଲ୍ଲୀ ମାନେ କେମିତି କେଜାଣି ଏତେ ଶକ୍ତ ହେଇଯାନ୍ତି | ସମୟ ନିହାତି ଭାବେ କିଛି ମାତ୍ରା ରେ ଦାୟୀ କିନ୍ତୁ ସ୍ତ୍ରୀ ମାନେ ହିଁ ଏମିତି । ଏମିତି ବହୁତ କିଛି ଘଟଣା ଯାହା ଉପରେ ଲେଖିଲେ ବୋଧେ ଉପନ୍ୟାସ ହେଇଯିବ | ଏତେ ଧୈର୍ୟ , ଶାନ୍ତ, ସରଳ ହେଇକି ବି ମା ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଚଳେଇ ଜାଣେ, ସତରେ ଭଗବାନ ବହୁତ ଫୁରସତ ରେ ମା ମନ କୁ ତିଆରି କରିଛନ୍ତି | କଥା କଥା ରେ କିଛି ଜଣ ନିଜର ଗୁଣ ଗାନ କରିବାରେ ପାରଙ୍ଗମ। ବହୁତ ସୁନ୍ଦର ଭାବରେ କଥା କୁ ଲଥା କରି ଲମ୍ବା ଉପନ୍ୟାସ ଟିଏ ଲେଖି ଦିଅନ୍ତି। ନିଜ ବିଷୟରେ, ନିଜ ପସନ୍ଦ ର ଲୋକଙ୍କ ବିଷୟରେ। କିନ୍ତୁ କଥା ଯଦି ଆଉ କାହା ଉପରକୁ ଆସେ କି ନିଜ ଘର ର ସ୍ତ୍ରୀ ଲୋକଙ୍କ ଉପର କୁ କଥା ଆସେ " ହଁ ମ ସେ ସେଥିରେ ବଡ଼ କଥା କଣ, ଏତିକି ତ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଜଣା । ଘର ହିଁ ତ ସମ୍ଭାଳିବାର ଅଛି" ଆଉ ଏଇ ପରିପ୍ରେକ୍ଷୀରେ ରେ...

ମୁଁ କାହାର ନୁହେଁ, କେହି ମୋର ନୁହନ୍ତି।

କେହି ପଚାରିଥିଲେ ହୁଏ ତ କହିଥାନ୍ତି, ହେଲେ କେହି ପଚାରିଲେନି। ମାଟି ଠୁ କରଜ ନେଇ, ଆକାଶ କୁ ଲାଞ୍ଚ ଦେଇ, ବିକଳାଙ୍ଗ ସ୍ଵପ୍ନ କୁ ଅନୁଧ୍ୟାନ କରୁଛି, କାହାକୁ ବୁଝେଇପାରୁନି ବୋଲି ଅସଫଳ ର ଆଖ୍ୟା ରେ ଜୀବନ। ଆକାଶ ମୋର ନୁହେଁ, ମାଟି ମୋର ନୁହେଁ, ମୁଁ କାହାର ନୁହେଁ, କେହି ମୋର ନୁହନ୍ତି।

Let me just be a friend.

I Just Want to Be a Friend. I just want to be a friend. Not a role to fulfill. Not a name to carry. Not someone you label daughter, colleague, woman, or "just a girl". I don’t want to be measured by how softly I speak, how much I care, or how little I ask for. I just want to sit beside you without being anyone to you. Not someone you feel responsible for. Not someone you're careful with. Just... someone you're real with. Let me pour my heart in the silence of a chai cup, without you searching for hidden meaning. Let me speak of my day, my fears, my awkward little hopes without you assuming I'm asking for more. Don’t compare me to the brand I wear, The figure I don’t have, The shade of my skin, Or how much I earn or save. Don’t calculate my worth in labels or paychecks. I’m not a product. I’m a person. Don't look at me like a riddle. Don't answer me like a question. I don't want to be someone's daughter. Or someone's "maybe". Or someon...

ଚନ୍ଦ୍ରମଲ୍ଲୀ

ନିଜ ଜୀବନର ନାୟିକା, ବିନା କାରଣ ରେ ହସିଦିଏ। ନାୟକ ଆସି ହାତ ଧରେନି , ଚାହା କପେ ଯାଚେନି। ପବନ ରେ ଚୁଟି ମାନେ ଉଡ଼ିଲେ, କେହି ତାର ଫଟୋ ଉଠାନ୍ତିନି। ଶାଢ଼ୀ ରେ ସେ ସୁନ୍ଦର ଦେଖା ଗଲେ ବି, କେହି ତା ପାଇଁ କବିତା ଲେଖନ୍ତିନି। ସେ ହସିଦିଏ, ପ୍ରତିଦିନ ଚେଷ୍ଟା କରେ ନିଜକୁ ଭଲପାଇବା ଶିଖିବାକୁ। ଆଇନା ସାମ୍ନାରେ ହସେ, ପଛେ ନିଜେ ନିଜକୁ ପଚାରେ “କେବେ ନିଜ ହୃଦୟକୁ ମୁଁ ସତରେ ବୁଝିପାରିବି?” ସେ ଜାଣେ, ପ୍ରେମ କେବେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନୁହେଁ। କେବେ ଛନ୍ଦ ପଡିନଥିବା କବିତା ଧାଡ଼ିଏ, ତ କେବେ ଝାପସା ହେଇ ଆସୁଥିବା ଫିକା ନାଲି ରଙ୍ଗ। ତଥାପି ଅପେକ୍ଷା କରେ ସେ, ଯିଏ ତାର ନିରବତା ବୁଝିବ, ଚାହା କପେ ଆଉ ସମୟ ନେଇ ଆସିଥିବ, ଅଧା ଲେଖା କବିତା କୁ କବି ଯେମିତି ଭଲ ପାଏ, ସେମିତି ଢଙ୍ଗ ରେ ତାକୁ ଭଲ ପାଇବ ।

सफ़र मैं हिस्सेदारी ख़त्म होने पे भी भारी सा लगता है ।

तुम, मैं, हम सब बिना चाहे भी एक कहानी के हिस्से बनते हैं। तुम मानो या ना मानो एक खालीपन तुम्हारी, मेरी और हमारी हिस्सेदारी है। और वो कहानी, हमारी जिंदगी का हिस्सा बनते जाते हैं। एक रोज फिर से, तुम अपने रास्ते निकल जाओगे, और मैं अपने। एक सुबह होगी, फिर टकरायेंगे किसी कहानी में हम, हम मिलेंगे, मैं तुम्हें अपनी seat से बैठने को बोलूंगी, तुम मुस्कुराना, बैठ जाना और मेरे station तक मुझे छोड़ने आना। सफ़र मैं हिस्सेदारी ख़त्म होने पे भी भारी सा लगता है ।

सुंदरता देखने वालों की आँखों में होती है

एक लड़का था… उसके बिखरे बाल भी बड़े कमाल लगते थे, और हँसी में जो गड्ढा पड़ता, बस दिल ही खो जाता। मैं कुछ बोलती, तो बस मुस्कुराकर कहता— "अरे, बातें करना सीख ले।" सफ़ेद शर्ट में तो और भी जंचता था, शरमाते हुए उसका अंदाज़… बस दिल खुश हो जाता। उससे दिल की हर बात हो जाती थी, वह सुनता, समझता, मुस्कुराता, और फिर समझा भी देता। मैं खुद को कुछ बोलूँ, तो वह कहता— "सुंदरता तो देखने वालों की आँखों में होती है।" मैं सज़कर जाती, तो वह पीछे से नज़र चुराकर देखता, और मुझे जैसे और भी प्यारा लगता। बातों-बातों में समय निकल जाता, और मैं सोचती ना जाने फिर कब मिलेंगे, कहां होंगे, कैसी हालत में होंगे। पर वो लड़का… मोहब्बत का शगुन था। अगर कह पाती, तो बस इतना कहती— जब मैं खुद से पूछती, कोई मुझसे प्यार क्यों करेगा… तो बस उसकी हँसी याद आती, और वो शब्द— "सुंदरता देखने वालों की आँखों में होती है।"

She Is Me!

Image
She is a girl, with hundreds of dreams that refuse to stand in a queue. They scatter like windblown pages, never overlapping, never asking for permission to exist. She doesn’t want a spotlight, or a well-crafted plan. She wants freedom, the kind no one scripts for her. Not the 9-to-5 freedom, but the Tuesday-afternoon-in-silence kind. She craves peace, that doesn’t come in podcasts or paid retreats but the one that hums quietly from open windows and rustling leaves. She wants a home, that doesn’t echo with shoulds just warmth, soft lights, and corners she can cry in without being questioned. She wants flowers, that no one asks for, the ones that bloom in shadows, the ones that won’t make it to Instagram or overpriced bouquets. She dreams of a winter, not crowded with coats and airports, just snowy silence, a bowl of hot Maggi, and socks that don’t match. A palette of colours, a canvas that listens, a camera to capture not influencers but the ugliest emotions, awkward silences, old dust...

First things to go missing are socks and common sense.

Ever lose something and wonder, "Is the universe playing a prank on me, or is there a bigger plan?" They say the first things to go missing are socks and common sense. I can confirm this because I lost a sock last week and almost went full “Main aisa kyun hoon?” trying to find it. (Of course, my mom found it with her magic touch and in seconds. Moms are way better than Google Maps!) But life isn’t just about lost socks. We lose keys, opportunities, peace of mind, and sometimes ourselves. And in those moments, it feels like “Mere paas kuch bhi nahi bacha.” Everyone is ahead of me. Everyone is growing. But here’s what I’ve learned what’s lost isn’t always gone; it’s just taking the scenic route back to you.' Like the time I lost out on a job, I was dying to get. It felt like the end of the world. I thought. But a few months later, I got an even better offer. That’s when I realized that timing is everything. What’s meant for us always finds a way, even if it takes longer tha...

ଶିଳାଲେଖର ପ୍ରେମ ଓ ଶେଷ ପାହାଚ

Image
Credit: Gemini ସେଦିନ ଚାନ୍ଦିନୀ ଚୌକର ସେହି କାଳଜୟୀ ଗଳିଗୁଡ଼ିକରେ କେବଳ ଭିଡ଼ ନଥିଲା, ବରଂ ବୁଣି ହୋଇ ରହିଥିଲା ଶତାବ୍ଦୀ ଶତାବ୍ଦୀର ଅକୁହା ଗାଥା। ଚାରିପଟେ ପୁରୁଣା ଦିଲ୍ଲୀର ସେହି ମସଲାର ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାସ୍ନା ଆଉ ମଣିଷଙ୍କ ସ୍ରୋତ। ମୁଁ ଯେତେବେଳେ ମୋର ସେହି ହଳଦିଆ ଆଉ ମାରୁନ୍ ରଙ୍ଗର ଶାଢ଼ୀଟିକୁ ଅତି ସନ୍ତର୍ପଣରେ ସଜାଡ଼ି, କାନିରେ ନିଜ ନାରୀତ୍ୱର କୋମଳତାକୁ ଆବୃତ୍ତ କରି ତାଙ୍କ ସାମ୍ନାକୁ ଆସିଲି, ମୋ ପାଦର ନୂପୁର ଶବ୍ଦ ହୁଏତ ସେହି କୋଳାହଳରେ ଦବି ଯାଇଥିଲା, କିନ୍ତୁ ମୋ ମନର ସ୍ପନ୍ଦନ କୌଣସି ଝଡ଼ଠାରୁ କମ୍ ନଥିଲା। ମୁଁ ଭାବିଥିଲି, ସେ ମୋତେ ଦେଖି ବିଚଳିତ ହେବେ, ହୁଏତ କୌଣସି ଶାବ୍ଦିକ ପ୍ରଶଂସାର ପାହାଚ ଗଢ଼ି ମୋତେ ପଲକହୀନ କରିଦେବେ। କିନ୍ତୁ ସେ କିଛି କହିଲେ ନାହିଁ। ତାଙ୍କର ସେହି କଳା ଚେକ୍ ସାର୍ଟ ଭିତରେ ସେ ଜଣେ ଗମ୍ଭୀର ଶିଳାଲେଖ ଭଳି ଠିଆ ହୋଇଥିଲେ। ତାଙ୍କର ପ୍ରଶସ୍ତ କାନ୍ଧ ଏବଂ ସେହି ଦୁର୍ଦ୍ଦାନ୍ତ ପୌରୁଷ ମୋ ଭିତରର ସୂକ୍ଷ୍ମ ନାରୀତ୍ୱକୁ ଯେମିତି ଏକ ନିରାପଦ ଆଶ୍ରୟ ପ୍ରଦାନ କରୁଥିଲା। ସେ କେବଳ ଚାହିଁ ରହିଥିଲେ, ଏକ ଏମିତି ଚାହାଣି ଯେଉଁଥିରେ ପ୍ରଶଂସାର ଶସ୍ତାପଣ ନଥିଲା, ଥିଲା ଏକ ନିବିଡ଼ ଆବେଗ। ଯେମିତି ସେ ମୋତେ ନୁହେଁ, ବରଂ ମୋ ଅସ୍ତିତ୍ୱର ପ୍ରତିଟି ପରସ୍ତକୁ ଅତି ତନ୍ମୟତାର ସହ ପଢୁଥିଲେ। ଆମେ ମଧ୍ୟାହ୍ନ ଭୋଜନ ପାଇଁ ଅଟକିଲୁ। ଟେବୁଲ ଉପରେ ସଜା ହୋଇଥିଲା ଗରମ ଗରମ ଅମୃତସରୀ ନାନ୍, ଘିଅରେ ଭରପ...

"How you treat your breakfast is how you treat your life."

Image
Credit: Pinterest   "How you treat your breakfast is how you treat your life." Oh! Sorry, this is not a health related post. i just read this somewhere and somehow related to this. Fast mornings. Half-eaten breakfasts. Rushed thoughts. Constant hurry. After a time, life feels like it’s always running somewhere. In between all this… there is a cup of coffee (not just a drink). This is more a small pause, quietest chance to breathe with YOURSELF. The last few months were busy. New team, new role, new expectations. I was out of linkedin, even i'm posting this after a long time. Anyways, everything looked right. I got what I wanted (greatful) I was present… but not really present. Last saturday morning, I made my coffee, added two spoons of sugar ( broke my addiction of black coffee). Sat down, sipped, and something simple came to mind. Coffee doesn’t fight na! It doesn’t fight the water. It doesn’t fight the heat. It slowly blends in. Takes IT'S TIME. Adjusts and then…...